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दिल की बात लबों पर लाकर, अब तक हम दुख सहते हैं |


दिल की बात लबों पर लाकर, अब तक हम दुख सहते हैं| 
हम ने सुना था इस बस्ती में दिल वाले भी रहते हैं| 

बीत गया सावन का महीना मौसम ने नज़रें बदली, 
लेकिन इन प्यासी आँखों में अब तक आँसू बहते हैं| 

एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं, 
दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं| 

जिस की ख़ातिर शहर भी छोड़ा जिस के लिये बदनाम हुए, 
आज वही हम से बेगाने-बेगाने से रहते हैं| 

ये चाँदनी भी जिनको छूने से डरती है














ये चाँदनी भी जिनको छूते हुए डरती है 
दुनिया यूँ ही फूलों को पैरों से मसलती है 
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है 
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है 
लबों में चिंगारी जैसे कोई रख दे 
यूँ याद तेरी शब् भर सीने में सुलगती है
आ जाता है खुद खीँच कर दिल, सीने से पटरी पर 
जब रात के सरहद से इक रेल गुजरती है 
आंसू कभी पलकों पर तो देर नही रुकते 
उड़ जाते हैं यूँ पंछी जब शाख लचकती है 
खुश रंग परिंदों के लौट आने के दिन आये 
बिछड़े हुए मिलते हैं, जब बर्फ पिघलती है. 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam :Bashir Badr

शाम से आँख में नमी सी है !















शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है
दफ्न कर दो हमे कि साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है
वक़्त रहता नही कहीं छुपकर
इस की आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नही रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam : Gulzar

सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं














सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं
अपने गुमगश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं
जल गया सारा बदन इन मौसमों के आग में
एक मौसम रूह का है जिसमे अब जिन्दा हूँ मैं
मेरे होठों का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे
तूने मुझको बाग जाना, देख ले सेहरा हूँ मैं
देखिये मेरी पज़ीराई को अब आता है कौन
लम्हा भर को वक़्त के दहलीज़ पर आया हूँ मैं 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam : Athar Nafees

हँसाती थी मुझको, फिर रुला भी देती थी...














हंसाती थी मुझ को, फिर रुला भी देती थी
कर के वो मुझसे अक्सर वादे, भुला भी देती थी
बेवफा थी बहुत मगर, अच्छी लगती थी दिल को 
कभी-कभी बातें मोहब्बत की, सुना भी देती थी
थाम लेती थी मेरा हाथ, खुद यूँ ही
कभी अपना हाथ मेरे हाथ से, छुड़ा भी लेती थी
कभी बेवक्त चली आती थी, मिलने को
कभी कीमती पल मोहब्बत के, गवां भी देती थी
अजब धुप-छाव सा, मिजाज़ था उसका 
मोहब्बत भी करती थी, और दिल दुखा भी देती थी

दिलों में समा नही सकती...













लबों पे रूकती, दिलों में समां नही सकती 
वो एक बात जो लफ़्ज़ों में आ नही सकती 
जो दिल में हो नज़र-ए-ग़म तो अश्क पानी है 
के आग खाक को कुंदन बना नही सकती 
यकीन, गुमान से बाहर तो हो नही सकता 
नज़र ख्याल से आगे तो जा नही सकती 
दिलों की रम्ज़ फ़क़त एहल-ए-दिल जानते हैं 
तेरी समझ में मेरी बात आ नही सकती 
ये सौज-ए-इश्क तो गूंगे का ख्वाब है जैसे 
मेरी जुबां मेरी हालात बता नही सकती 
सिमट रही है मेरे बाजुओं के हलके में 
ह्या के बोझ से पलकें उठा नही सकती 
जो कह रहा है सुलगता हुआ बदन उस का 
बता भी पाती नही, और छुपा नही सकती 
एक ऐसे हिजर की आतिश है मेरे दिल में जैसे 
किसी विशाल की बारिश बुझा नही सकती 
तो जो भी होना है अमजद यहीं पे होना है 
ज़मीं मदार से बाहर तो जा नही सकती 
                                           :- अमज़द इस्लाम अमजद 

मेरी चाहत का है महावर ये नगर जैसा भी है....!

जिस तरह की हैं ये दीवारें ये दर जैसा भी है
सर छिपाने को मयस्सर तो है घर जैसा भी है
उस को मुझसे मुझको उस से निस्बतें हैं बेशुमार
मेरी चाहत का है महावर ये नगर जैसा भी है
चल पड़ा हूँ शौक़-ए-बेपरवाह को मुरशद मान कर
रास्ता परपेच है या पुर्खतर जैसा भी है
सब गंवारा है थकन दुखन सारी चुभन
एक खुशबू के लिए है ये सफ़र जैसा भी है
वो तो है मखसूस इक तेरी मोहब्बत के लिए
तेरा 'अनवर' बाहुनर या बेहुनर जैसा भी है

Poet of the Poem / Ghazal or Nazam :Anwar Masood

हर तरफ आप किस्सा आप जहाँ से सुनिए


चाँद से फूल से या मेरी जुबान से सुनिए
हर तरफ आप किस्सा जहां से सुनिए

सबको आता है दुनिया को सता कर जीना
ज़िन्दगी क्या मुहब्बत के दुआ से सुनिए

मेरी आवाज़ पर्दा मेरे चेहरे का
मैं हूँ खामोश जहाँ मुझको वहाँ से सुनिए

क्या जरुरी है कि हर पर्दा उठाया जाये
मेरे हालात अपने मुकाम से सुनिए
                                                                                                                                               - Nida Fazil

कोई हमसे पूछे सावन का महीना क्या है | Koi Humse Puchhe Sawan Ka Mahina Kya Hai


जीने वालों से पूछते हो जीने का सबब 
मरने वाले से जरा पूछो जीना क्या है 
बरसती  रहती  हैं उनपर बूंदों की लड़ियाँ सदा 
कोई हमसे पूछे सावन का महीना क्या है 

दमकते रेत पर चल कर पहुचे जो तलाब तक 
हाथ लगाते ही पानी जैसे सूख सा गया 
उन्हें क्या पता जिन्हें मिले हैं जाम सुराही से 
कोई हमसे पूछे मेहनत का पसीना क्या है 

महफिलों में अक्सर कहते हैं सब 
दिल-ए-नाशाद ना बयां करो अपना 
करें ना हमपर रहम मगर 
कोई हमसे पूछे अश्कों को पीना क्या है ?

साँसे हैं तब तक एक मुलाक़ात कर लो 
कुछ नही तो बस ये सवालात कर लो 
चले जाएँगे जब तक कौन बतलाएँगे तुम्हे 
दिल के जख्मों को आँखों से सीना क्या है ?

और क्या वजह चाहिए मुझको जश्न मनाने की !!

















आब है शराब है और उम्मीद उसके आने की 
क्या और वजह चाहिए मुझको  जश्न मनाने की 

हर घड़ी वो मेरा इम्तहान लेता है 

आज बारी है मेरी  उनको आज़माने की 

ना बहाओ अश्कों को को कि ये कम पड़ जाएंगे 

ये तो बस शुरुआत है मेरे ग़म के फ़साने की  

यही की थी मोहब्बत के सबक की इब्तदा मैंने !!














यही की थी मोहब्बत के सबक़ की इब्तदा मैंने,
यही की जुर्रत-ए-इज़हार-ए-हर्फ़-ए-मुद्दा मैंने,
यहीं देखे थे इश्क-ए-नाज़-ओ-अंदाज़-ए-हया मैंने,
यहीं पहले सुनी थी दिल धड़कने की सदा मैंने,
यहीं खेतों में पानी के किनारे याद है अब भी.

दिलों में इज्दहम-ए-आरज़ू लब बंद रहते थे,
नज़र से गुफ्तगू होती थी, दम उल्फ़त के भरते थे,
ना माथे पर सिकन होती , ना जब तेवर बदलते थे,
खुदा भी मुस्कुरा देता था जब हम प्यार करते थे,
यही खेतो में पानी के किनारे याद है अब भी.

वो क्या आता के गया दौर में जाम-ए-शराब आता,
वो क्या आता रंगीली रागिनी रंगीन रबाब आता,
मुझे रंगीनियों में रंगने वो रंगीन सहाब आता, 
लबों के मय पिलाने झूमता मस्त-ए-शबाब आता, 
यहीं खेतों में पानी के किनारों याद है अब भी. 

हया के बोझ से जब हर क़दम पर लगाज़िशें होतीं, 
फजां में मुन्तसर रंगीन बदन के लाराज़िशें होतीं, 
रबाब-ए-दिल के तारों में मुसलसिल जुम्बिशें होतीं, 
खिफा-ए-राज़ के पुर्लुफ्त बहम कोशिशें होती, 
यही खेतों में पानी के किनारे याद है अब भी, 

बाला-ए-फ़िक्र-ए-फर्दा हम से कोसों दूर होती थी, 
सुरूर-ए-सरमदी से जिंदगी मामूर होती थी, 
हमारी खिलवत-ए-मासूम रश्क-ए-तुर होती थी, 
मलक झुला झूलते थे ग़ज़ल-ख्वान हुर होती थी, 
यहीं खेतों में पानी के किनारे याद है अब भी. 

ना वो खेत बदली हैं न वो आब-ए-रवां बागी, 
मगर उस ऐश-ए-रफ्ता का है इक धुंधला निशान बागी. 
Poet of the Poem/Ghazal or Nazam: Makhdoom Mohiuddin

कभी इंसान सही या गलत नही होता.....














कभी इंसान सही या गलत नही होता,
एक नज़रिया उसे सही या गलत बनाता है,
कोई देखता है कीचड़ में कमल का फूल,
तो किसी को चाँद में भी दाग नज़र आता है !!

किसी की बेवफाई का ग़म क्या करना,
वक़्त तो अक्सर बड़े-बड़े को झुकता है,
बदल जाए ना क्यूँ इंसान की फ़ितरत,
साल भर में चार बार मौसम भी बदल जाता है !!

कभी इनकार का सच कडवा लगता है,
और कभी झूठी हमदर्दी भी प्यारी लगती है,
पर क्यूँ इसपर भी नाराज़ होना,
ये तो अपने मन की मजबूरी होती है !!

रंग, रूप और दौलत का खेल भी अजीब होता है,
खुशियाँ खरीद नही सकता, ग़म बेच नही पाता है,
पर फिर भी कैसी आज़माइश है दुनिया की,
जो समझ गया वो अकेला, जो नहीं वो महफ़िल में होता है !!

सुन लो मेरी बात कहीं से आ जाओ.....












तन्हा है मेरी जात कहीं से आ जाओ 
सुन लो मेरी बात कहीं से आ जाओ 
दुश्मन बाज़ी जीत रहा है चुपके से 
होने को है मात कहीं से आ जाओ 
कच्ची इटें और इमारत गेरे की 
और उसपर बरसात कहीं से आ जाओ 
दिल की बस्ती पर है खौफ अंधेरों का 
हो जाये न रात कहीं से आ जाओ 
कच्ची उमरें उस पर ख्वाब मोहब्बत के 
क्या क्या हैं ज़ज्बात कहीं से आ जाओ 
आँखे रास्ता देख रही हैं मुद्दत से 
गर्दिश में हैं हालात कहीं से आ जाओ 
मौसम मौसम लोग बदलते हैं "ख्वाहिश"
दिल पर हैं सदमात कहीं से आ जाओ.… 

ये तूने क्या किया है !











है हसरतों की ये ख्वाइश, या खुदा की है नुमाइश 
जो आजकल गुलज़ार वीरान हुआ है 
जो होता है वो अच्छे के लिए होता है अगर 
तो क्यूँ मैं मानना ना चाहूँ, कि जो हुआ है वो भला हुआ है !

कभी सोचता हूँ, और चौंक जाता हूँ ,
की ये जो हुआ, वो आखिर क्या हुआ है ?
बदलनी ही थी किस्मत को राह अगर,
तो वो क्यों चुनी जिसमे तू शामिल ना हुआ है ?

रात दिन, दिन रात, एक ही सवाल खाए है मुझे,
कि किस खता से तू रुसवा हुआ है ?
तुझे बचाने की जरुरत मेरी इतनी बदगुमान थी अगर,
तो क्यूँ इस रंजिश में मेरा ही दिल क़ुर्बान हुआ है ?

क्या करूँ, कैसे कहूँ, कि तेरी नादानी का ये कैसा वाक़िआ है,
कि जब खुलेंगे आँखें तेरी, तो तुझे लगेगा आइना भी दुश्वार हुआ है,
और मिला सके उस वक़्त तू खुद के नजर अगर,
तो याद करके इस पल को सोचना, कि तूने ये क्या किया है !

मैं गुरेज़ क्या करता उसके साथ चलने से















मैं गुरेज क्या करता उस के साथ चलने से 
जख्म तो नहीं भरता रास्ते बदलने से 
इशरत शबाना तो यार की रज़ा से है 
ये ख़ुशी नहीं मिलती सिर्फ शाम ढलने से 
आरजू की चिंगारी कब तक सुलग सकती 
बुझ गया है दिल आखिर बार-बार जलने से 
ज़िन्दगी का हर मोहरा बेरुखी के रुख पर है 
ये बिसात क्या उलटेगी एक चाल चलने से 
डूबता हुआ सूरज क्या मुझे उजाले देगा 
मैं चमक उठू शायद चाँद के निकलने से 

बेदर्दी ये ज़माना है


मेरे हर लफ्ज़ में दर्द का फ़साना है 
मेरे हर रोम में गम का एक तराना है 
वो इसलिए नही क्योकि ये दिल आशिकाना है 
पर इस लिए क्युकी बेदर्दी ये ज़माना है 

सब कहते हैं कि भूल जाओ जख्म अब पुराना है 
उठो ऐसे की समझो सितारों को पाना है 
ज़ालिम बड़ा काम ये दिल को समझाना है 
कब माना था ये , जो अब इसने माना है 

आप कहते हैं कि चार पंक्तियाँ सुनाइए 
अपने नगमों से महफ़िल की शोभा बढाइये 
पर गम कहाँ किसी महफ़िल का खज़ाना है 
जैसे लाज़मी शमा-ए-महफ़िल में जलता परवाना है 
वैसे ही जनाब , बड़ा बेदर्दी ये जमाना है