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भूल गये हैं जूते कहाँ उतारे थे















छोटी-छोटी छितराई यादें... बिछीं हुई हैं लम्हों की लॉन पर,
नंगे पैर उनपे चलते-चलते इतनी दूर आ गये हैं,
कि भूल गये हैं जूते कहाँ उतारे थे.

एड़ी कोमल थी जब आये थे,
थोड़ी सी नाज़ुक है अभी भी... और नाज़ुक ही रहेगी
इन खट्टी-मिट्ठी यादों की शरारत जब तक इन्हें गुदगुदाती रहेगी...
सच... भूल गये हैं जूते कहाँ उतारे थे,
पर लगता है अब उनकी जरुरत नही.


chhoti-chhoti chhitraayi yaadein.. bichhi huyi hain lamhon ki lawn par,
nange pair unpe chalte-chalte itni dur aa gye hain,
ki bhool gye hain jute kaha utaare the.

edi komal thi jab aaye the,
thodi si nazuk hai abhi bhi... aur nazuk hi rahegi,
in khatti-mitthi yaadon ki shararat jab tak inhe gudgudati rahegi...
sach... bhool gye hain joote kahan utaare the,
par lagta hai ab unki jarurat nhi.

मोहब्बत पे मेरी फिर उसको ऐतबार आएगा !


देख कर जिसे दिल को मेरे क़रार आएगा 
लौट कर कभी तो मेरा वो यार आएगा 
वो मुझे भूल भी गया है तो कोई बात नही 
मगर ख्याल उसको मेरा बार बार आएगा 
मैं जानता हूँ उसके दिल दिल में मेरे लिए नफरत है मगर 
एक दिन वो मेरे पास हो के शरम-सार आएगा 
वो भी रो देगा मेरी हालत देख कर 
मोहब्बत पे मेरी फिर उसको ऐतबार आएगा 
कहता फिरेगा वो लोगो से बहुत अच्छा था मेरा यार 
जब मैयत पे मेरी वो हो के अश्क-बार आएगा 

दिल की बात लबों पर लाकर, अब तक हम दुख सहते हैं |


दिल की बात लबों पर लाकर, अब तक हम दुख सहते हैं| 
हम ने सुना था इस बस्ती में दिल वाले भी रहते हैं| 

बीत गया सावन का महीना मौसम ने नज़रें बदली, 
लेकिन इन प्यासी आँखों में अब तक आँसू बहते हैं| 

एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं, 
दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं| 

जिस की ख़ातिर शहर भी छोड़ा जिस के लिये बदनाम हुए, 
आज वही हम से बेगाने-बेगाने से रहते हैं| 

My Shayari






तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूँ मैं 
कि तू अगर मिल भी जाए तो अब मिलने का गम होगा 

Short shayari




रंजिश ही सही दिल दुखाने के लिए आ 
आ फिर से मुझे छोड़ जाने के लिए आ 
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम 
तू मुझसे खफा है तो जमाने के लिए आ !

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यूँ तो मसले औ मुद्दे बहुत हैं,
लिखने को मगर...
कमबख्त इन कागजों को तेरा ही 
जिक्र अजीज है...

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इक बार उलझना है तुमसे 
बहुत कुछ सुलझाने के लिए...


ना जाने कब से इंतज़ार है उसका 
जो कह गया था मेरा इंतज़ार मत करना !

मासूम सा था वो जान मेरा !

खुबसूरत, ख्वाब था वो
जब वो मेरे साथ था 
सारा जहाँ था मेरा 
मासूम सा था वो जान मेरा 

कुछ पल का साथ उसका
जिन्दगी थी और खुशी भी 
थी वहाँ पतवार भी
थी हजारों कश्तियाँ 

मेरा वो अभिमान था 
मेरा वो पहचान था 
या यूँ कहो की जान था 
मासूम सा.......

समंदर सारे शराब होते तो सोचो कितना बवाल होता !

समंदर सारे शराब होते तो सोचो कितना बवाल होता,

हक़ीक़त सारे ख़्वाब होते तो सोचो कितना बवाल होता,
किसी के दिल में क्या छुपा है ये बस ख़ुदा ही जानता है,


दिल अगर बेनक़ाब होते तो सोचो कितना बवाल होता
थी ख़ामोशी हमारी फितरत में तभी तो बरसो निभ गयी लोगो से,


अगर मुँह में हमारे जवाब होते तो सोचो कितना बवाल होता,

हम तो अच्छे थे पर लोगो की नज़र में सदा बुरे ही रहे,
कहीं हम सच में ख़राब होते तो सोचो कितना बवाल होता..

अपने कहने को तो बहुत मिले...














क्या ख़ूब ज़माने की वफ़ा देखते रहे 
हर बात में हम अपनी खता देखते रहे 

यूँ तो ज़माने ने बदले बहुत रंग 
पर हम उसी की ज़फ़ा देखते रहे 

मुश्किलों में थी ज़िन्दगी हमारी 
हम तो बस हालातों का मज़ा देखते रहे 

अपना कहने को तो बहुत मिले 
पर हम उसका एहसास देखते रहे 

यूँ तो चाहत का समन्दर था हमारे पास
हम तो किसी के मिलने की आस देखते रहे...

ख्वाब













ख्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है 
ऐसी तन्हाई है कि मर जाने को जी चाहता है 
घर के वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यों 
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है 
डूब जाऊं कोई मौज निशान तक ना बताए 
ऐसी नदी में उतर जाने को जी चाहता है 
कभी मिल जाये तो रस्ते की थकान जग पड़े 
ऐसी मंजिल से गुजर जाने को जी चाहता है 
वो ही पैमान जो कभी जी को खुश आया था बहुत 
उसी पैमान से मुकर जाने को जी चाहता है 

Poet of the Poem / Ghazal or Nazam :Iftikhar Arif

ये चाँदनी भी जिनको छूने से डरती है














ये चाँदनी भी जिनको छूते हुए डरती है 
दुनिया यूँ ही फूलों को पैरों से मसलती है 
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है 
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है 
लबों में चिंगारी जैसे कोई रख दे 
यूँ याद तेरी शब् भर सीने में सुलगती है
आ जाता है खुद खीँच कर दिल, सीने से पटरी पर 
जब रात के सरहद से इक रेल गुजरती है 
आंसू कभी पलकों पर तो देर नही रुकते 
उड़ जाते हैं यूँ पंछी जब शाख लचकती है 
खुश रंग परिंदों के लौट आने के दिन आये 
बिछड़े हुए मिलते हैं, जब बर्फ पिघलती है. 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam :Bashir Badr

शाम से आँख में नमी सी है !















शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है
दफ्न कर दो हमे कि साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है
वक़्त रहता नही कहीं छुपकर
इस की आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नही रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam : Gulzar

सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं














सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं
अपने गुमगश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं
जल गया सारा बदन इन मौसमों के आग में
एक मौसम रूह का है जिसमे अब जिन्दा हूँ मैं
मेरे होठों का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे
तूने मुझको बाग जाना, देख ले सेहरा हूँ मैं
देखिये मेरी पज़ीराई को अब आता है कौन
लम्हा भर को वक़्त के दहलीज़ पर आया हूँ मैं 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam : Athar Nafees

हँसाती थी मुझको, फिर रुला भी देती थी...














हंसाती थी मुझ को, फिर रुला भी देती थी
कर के वो मुझसे अक्सर वादे, भुला भी देती थी
बेवफा थी बहुत मगर, अच्छी लगती थी दिल को 
कभी-कभी बातें मोहब्बत की, सुना भी देती थी
थाम लेती थी मेरा हाथ, खुद यूँ ही
कभी अपना हाथ मेरे हाथ से, छुड़ा भी लेती थी
कभी बेवक्त चली आती थी, मिलने को
कभी कीमती पल मोहब्बत के, गवां भी देती थी
अजब धुप-छाव सा, मिजाज़ था उसका 
मोहब्बत भी करती थी, और दिल दुखा भी देती थी

तेरे बारे में जब सोचा नही था ...

तेरे बारे में जब सोचा नही था
मैं तन्हा था मगर, इतना नही था 
तेरी तस्वीर से करता थे बातें 
मेरे कमरे में आईना नही था 
समंदर ने मुझे प्यासा ही रखा 
मैं जब सहारा में था प्यासा नही था 
मनाने रूठने के खेल में हम 
बिछड़ जाएँगे सोचा न था 
सुना है बंद कर ली उसने आँखे 
कई रातों से वो सोया नही था 

उसकी गलियों से जब लौटे, अपना ही घर भूल गये...
















याद नही क्या क्या देखा, सारे मंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे, अपना ही घर भूल गये,
खूब गये परदेश कि अपने दीवारों दर भूल गये,
शीश महल ने ऐसा घेरा मिट्टी के घर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
तुझको भी जब कसमें अपने वादें याद नही,
हम भी अपने ख्वाब तेरी आँखों में रख कर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
मुझको जिन्होंने कोई उन्हें बतलाये नजीर,
मेरी लाश की पहलु में वो अपना खंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
याद नही क्या क्या देखा था सारे मंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.

दिलों में समा नही सकती...













लबों पे रूकती, दिलों में समां नही सकती 
वो एक बात जो लफ़्ज़ों में आ नही सकती 
जो दिल में हो नज़र-ए-ग़म तो अश्क पानी है 
के आग खाक को कुंदन बना नही सकती 
यकीन, गुमान से बाहर तो हो नही सकता 
नज़र ख्याल से आगे तो जा नही सकती 
दिलों की रम्ज़ फ़क़त एहल-ए-दिल जानते हैं 
तेरी समझ में मेरी बात आ नही सकती 
ये सौज-ए-इश्क तो गूंगे का ख्वाब है जैसे 
मेरी जुबां मेरी हालात बता नही सकती 
सिमट रही है मेरे बाजुओं के हलके में 
ह्या के बोझ से पलकें उठा नही सकती 
जो कह रहा है सुलगता हुआ बदन उस का 
बता भी पाती नही, और छुपा नही सकती 
एक ऐसे हिजर की आतिश है मेरे दिल में जैसे 
किसी विशाल की बारिश बुझा नही सकती 
तो जो भी होना है अमजद यहीं पे होना है 
ज़मीं मदार से बाहर तो जा नही सकती 
                                           :- अमज़द इस्लाम अमजद 

मेरी चाहत का है महावर ये नगर जैसा भी है....!

जिस तरह की हैं ये दीवारें ये दर जैसा भी है
सर छिपाने को मयस्सर तो है घर जैसा भी है
उस को मुझसे मुझको उस से निस्बतें हैं बेशुमार
मेरी चाहत का है महावर ये नगर जैसा भी है
चल पड़ा हूँ शौक़-ए-बेपरवाह को मुरशद मान कर
रास्ता परपेच है या पुर्खतर जैसा भी है
सब गंवारा है थकन दुखन सारी चुभन
एक खुशबू के लिए है ये सफ़र जैसा भी है
वो तो है मखसूस इक तेरी मोहब्बत के लिए
तेरा 'अनवर' बाहुनर या बेहुनर जैसा भी है

Poet of the Poem / Ghazal or Nazam :Anwar Masood

क्या कोई मंजिल मेरा मुक़द्दर है या यही मेरी अधूरी कहानी है | SketchyHeart














एक मोहब्बत है और उसकी एक निशानी है 
एक दिल है जैसे कोई हवेली पुरानी है 

सफ़र रात का है और रात भी तूफानी है 

समन्दर ही समन्दर है कश्ती भी डूब जानी है 

इब्तेदा-ए-इश्क से इन्तहा-ए-इश्क तक 

मैं ही था बेवफा और मैंने ही वफ़ा निभानी है 

मैं लौट आया हूँ मंजिल को देखकर 

यहाँ तो यादों की वीरानी ही वीरानी है 

ये इंतजार ख़त्म क्यों नही होता किससे पूछूँ

 क्या कोई मंजिल मेरा मुक़द्दर है या यही मेरी अधूरी कहानी है  

हर तरफ आप किस्सा आप जहाँ से सुनिए


चाँद से फूल से या मेरी जुबान से सुनिए
हर तरफ आप किस्सा जहां से सुनिए

सबको आता है दुनिया को सता कर जीना
ज़िन्दगी क्या मुहब्बत के दुआ से सुनिए

मेरी आवाज़ पर्दा मेरे चेहरे का
मैं हूँ खामोश जहाँ मुझको वहाँ से सुनिए

क्या जरुरी है कि हर पर्दा उठाया जाये
मेरे हालात अपने मुकाम से सुनिए
                                                                                                                                               - Nida Fazil