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भूल गये हैं जूते कहाँ उतारे थे















छोटी-छोटी छितराई यादें... बिछीं हुई हैं लम्हों की लॉन पर,
नंगे पैर उनपे चलते-चलते इतनी दूर आ गये हैं,
कि भूल गये हैं जूते कहाँ उतारे थे.

एड़ी कोमल थी जब आये थे,
थोड़ी सी नाज़ुक है अभी भी... और नाज़ुक ही रहेगी
इन खट्टी-मिट्ठी यादों की शरारत जब तक इन्हें गुदगुदाती रहेगी...
सच... भूल गये हैं जूते कहाँ उतारे थे,
पर लगता है अब उनकी जरुरत नही.


chhoti-chhoti chhitraayi yaadein.. bichhi huyi hain lamhon ki lawn par,
nange pair unpe chalte-chalte itni dur aa gye hain,
ki bhool gye hain jute kaha utaare the.

edi komal thi jab aaye the,
thodi si nazuk hai abhi bhi... aur nazuk hi rahegi,
in khatti-mitthi yaadon ki shararat jab tak inhe gudgudati rahegi...
sach... bhool gye hain joote kahan utaare the,
par lagta hai ab unki jarurat nhi.

मासूम सा था वो जान मेरा !

खुबसूरत, ख्वाब था वो
जब वो मेरे साथ था 
सारा जहाँ था मेरा 
मासूम सा था वो जान मेरा 

कुछ पल का साथ उसका
जिन्दगी थी और खुशी भी 
थी वहाँ पतवार भी
थी हजारों कश्तियाँ 

मेरा वो अभिमान था 
मेरा वो पहचान था 
या यूँ कहो की जान था 
मासूम सा.......

जीवन क्या है ?


जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है 
दो आँखों में एक से हँसना एक से रोना है 
जो जी चाहे वो मिल जाये कब ऐसा होता है 
हर जीवन, जीवन जीने का समझौता है 
अब तक जो होता आया है वो ही होना है 
रात अँधेरी भोर सुहानी यही ज़माना है 
हर चादर में दुःख का ताना सुख का बाना है 
आती सांस को पाना जाती सांस को खोना है 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam :Nida Fazli

ये चाँदनी भी जिनको छूने से डरती है














ये चाँदनी भी जिनको छूते हुए डरती है 
दुनिया यूँ ही फूलों को पैरों से मसलती है 
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है 
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है 
लबों में चिंगारी जैसे कोई रख दे 
यूँ याद तेरी शब् भर सीने में सुलगती है
आ जाता है खुद खीँच कर दिल, सीने से पटरी पर 
जब रात के सरहद से इक रेल गुजरती है 
आंसू कभी पलकों पर तो देर नही रुकते 
उड़ जाते हैं यूँ पंछी जब शाख लचकती है 
खुश रंग परिंदों के लौट आने के दिन आये 
बिछड़े हुए मिलते हैं, जब बर्फ पिघलती है. 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam :Bashir Badr

कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नही मरा करता है

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों 
मोती व्यर्थ लुटाने वालों 
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नही मरा करता है 

सपना क्या है, नयन सेज पर 
सोया हुआ आँख का पानी 
और टूटना है उसका ज्यों 
जागे कच्ची नींद जवानी 
गीली उमर बनाने वालो, डूबे बिना नहाने वालों 
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नही मरा करता है 

माला बिखर गयी तो क्या है 
खुद ही हल हो गयी समस्या 
आंसू गर नीलाम हुए तो 
समझो पूरी हुई तपस्या 
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों 
कुछ दीपों के मर जाने से, आँगन नही मरा करता है 

खोता कुछ भी नही यहाँ पर 
केवल जिल्द बदलती पोथी 
जैसे रात उतार चांदनी 
पहने सुबह धूप की धोती 
वस्त्र बदल कर आने वालों, चाल बदल कर जाने वालों 
चंद खिलौनों के खोने से, बचपन नही मरा करता है 
                    - गोपाल दास 'नीरज'

तेरे बारे में जब सोचा नही था ...

तेरे बारे में जब सोचा नही था
मैं तन्हा था मगर, इतना नही था 
तेरी तस्वीर से करता थे बातें 
मेरे कमरे में आईना नही था 
समंदर ने मुझे प्यासा ही रखा 
मैं जब सहारा में था प्यासा नही था 
मनाने रूठने के खेल में हम 
बिछड़ जाएँगे सोचा न था 
सुना है बंद कर ली उसने आँखे 
कई रातों से वो सोया नही था 

उसकी गलियों से जब लौटे, अपना ही घर भूल गये...
















याद नही क्या क्या देखा, सारे मंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे, अपना ही घर भूल गये,
खूब गये परदेश कि अपने दीवारों दर भूल गये,
शीश महल ने ऐसा घेरा मिट्टी के घर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
तुझको भी जब कसमें अपने वादें याद नही,
हम भी अपने ख्वाब तेरी आँखों में रख कर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
मुझको जिन्होंने कोई उन्हें बतलाये नजीर,
मेरी लाश की पहलु में वो अपना खंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
याद नही क्या क्या देखा था सारे मंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.

जहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है ! Jahan ko Apni Tabahi ka Intzar Sa Hai.













कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है
जहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है
मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़ज़ा
कि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार सा है
मैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँ
कि आज दामन-ए-यज़दाँ भी तार-तार-सा है
सजा-सँवार के जिसको हज़ार नाज़ किए
उसी पे ख़ालिक़-ए-कोनैन शर्मसार सा है
तमाम जिस्म है बेदार, फ़िक्र ख़ाबीदा
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार सा है
सब अपने पाँव पे रख-रख के पाँव चलते हैं
ख़ुद अपने दोश पे हर आदमी सवार सा है
जिसे पुकारिए मिलता है इस खंडहर से जवाब
जिसे भी देखिए माज़ी के इश्तेहार सा है
हुई तो कैसे बियाबाँ में आके शाम हुई
कि जो मज़ार यहाँ है मेरे मज़ार सा है
कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है !!
                                                  ( कैफ़ी आजमी )

क्या कोई मंजिल मेरा मुक़द्दर है या यही मेरी अधूरी कहानी है | SketchyHeart














एक मोहब्बत है और उसकी एक निशानी है 
एक दिल है जैसे कोई हवेली पुरानी है 

सफ़र रात का है और रात भी तूफानी है 

समन्दर ही समन्दर है कश्ती भी डूब जानी है 

इब्तेदा-ए-इश्क से इन्तहा-ए-इश्क तक 

मैं ही था बेवफा और मैंने ही वफ़ा निभानी है 

मैं लौट आया हूँ मंजिल को देखकर 

यहाँ तो यादों की वीरानी ही वीरानी है 

ये इंतजार ख़त्म क्यों नही होता किससे पूछूँ

 क्या कोई मंजिल मेरा मुक़द्दर है या यही मेरी अधूरी कहानी है  

कैसे अब उसके बिना वक़्त गुज़ारा जाये ! | Kaise Ab Uske Bina Waqt Guzara Jaye




शाम के सांवले चेहरे को निखारा जाये 
क्यों न सागर से कोई चाँद उभारा जाये 
रास आया नही तस्कीन का साहिल कोई 
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाये 
मेहरबां तेरी नजर, तेरी आदाएं क़ातिल 
तुझको किस नाम से ऐ दोस्त पुकारा जाये 
मुझको डर है तेरे वादे पर भरोसा करके 
मुफ्त में ये दिल-ए-खुशफ़हम ना मारा जाये 
जिसके दम से तेरे दिन-रात दरख्शां थे "कातिल"
कैसे अब उसके बिना वक़्त गुज़ारा जाये 
                                                            कातिल शिफ़ाई

मुझको यकीन है सच कहती थी जो भी अम्मी कहती थीं | Mujhko Yakin Hai Sach Sahti thin Jo Bhi Ammi Kahti thin - Javed Akhtar












मुझको यकीन है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं 
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं 
इक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे रिश्ता तोड़ लिया 
इक वो दिन जब पेड़ के साखें बोझ हमारा सहती थीं 
इक ये दिन जब लाखों ग़म और अकाल पड़ा है आँशु का 
इक वो दिन जब ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं 
इक ये दिन सड़के रूठी - रूठी लगती हैं 
इक वो दिन जब "आओ खेलें" सारी गलियाँ कहती थीं 
इक ये दिन जब जगी रातें दीवारों को ताकती हैं 
इक वो दिन जब शाखों के भी पलकें बोझल रहती थीं 
इक ये दिन जब ज़हां में सारी अय्यारी के बातें हैं 
इक वो दिन जब दिल में सारी भोली बातें रहती थीं 
इक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामान रहता है 
इक वो घर जिसमे मेरी बूढी नानी रहती थीं. 

मेरी आरज़ू | Meri Aarzoo




कोई रात मेरे आशना, मुझे यूँ भी तो नशीब हो
न रहे ख्याल लिबास का, वो इतना मेरे करीब हो 

बदन की गर्म आंच से, मेरी आरजू को आग दे 
मेरा जोश बहक उठे, मेरा हाल भी अजीब हो 

तेरे चाशनी वजूद का सारा रस मैं चुरा लूँ
फिर तू ही मेरा मर्ज़ हो, और तू ही मेरा तबीब हो

जब भी मिलते हो...!! Jab bhi milte ho


जब भी मिलते हो..
उदासी की वजह दे जाते हो.

मेरे जज्बातों को...
ये कैसी हवा दे जाते हो.

ना चाहते हुए भी..
तेरे दर पर ले जाते हैं कदम.

इक तुम हो कि... 
मिलकर भी नही मिलते हो

सितम की हद भी...
सितमगढ़ लांघ जाते हो.

बेइन्तेहाँ दर्द देकर...
रोने भी नही देते हो.

ये तेरी कैसी चाहत...
कि चाहकर भी नही चाहते हो.

और क्या वजह चाहिए मुझको जश्न मनाने की !!

















आब है शराब है और उम्मीद उसके आने की 
क्या और वजह चाहिए मुझको  जश्न मनाने की 

हर घड़ी वो मेरा इम्तहान लेता है 

आज बारी है मेरी  उनको आज़माने की 

ना बहाओ अश्कों को को कि ये कम पड़ जाएंगे 

ये तो बस शुरुआत है मेरे ग़म के फ़साने की  

यही की थी मोहब्बत के सबक की इब्तदा मैंने !!














यही की थी मोहब्बत के सबक़ की इब्तदा मैंने,
यही की जुर्रत-ए-इज़हार-ए-हर्फ़-ए-मुद्दा मैंने,
यहीं देखे थे इश्क-ए-नाज़-ओ-अंदाज़-ए-हया मैंने,
यहीं पहले सुनी थी दिल धड़कने की सदा मैंने,
यहीं खेतों में पानी के किनारे याद है अब भी.

दिलों में इज्दहम-ए-आरज़ू लब बंद रहते थे,
नज़र से गुफ्तगू होती थी, दम उल्फ़त के भरते थे,
ना माथे पर सिकन होती , ना जब तेवर बदलते थे,
खुदा भी मुस्कुरा देता था जब हम प्यार करते थे,
यही खेतो में पानी के किनारे याद है अब भी.

वो क्या आता के गया दौर में जाम-ए-शराब आता,
वो क्या आता रंगीली रागिनी रंगीन रबाब आता,
मुझे रंगीनियों में रंगने वो रंगीन सहाब आता, 
लबों के मय पिलाने झूमता मस्त-ए-शबाब आता, 
यहीं खेतों में पानी के किनारों याद है अब भी. 

हया के बोझ से जब हर क़दम पर लगाज़िशें होतीं, 
फजां में मुन्तसर रंगीन बदन के लाराज़िशें होतीं, 
रबाब-ए-दिल के तारों में मुसलसिल जुम्बिशें होतीं, 
खिफा-ए-राज़ के पुर्लुफ्त बहम कोशिशें होती, 
यही खेतों में पानी के किनारे याद है अब भी, 

बाला-ए-फ़िक्र-ए-फर्दा हम से कोसों दूर होती थी, 
सुरूर-ए-सरमदी से जिंदगी मामूर होती थी, 
हमारी खिलवत-ए-मासूम रश्क-ए-तुर होती थी, 
मलक झुला झूलते थे ग़ज़ल-ख्वान हुर होती थी, 
यहीं खेतों में पानी के किनारे याद है अब भी. 

ना वो खेत बदली हैं न वो आब-ए-रवां बागी, 
मगर उस ऐश-ए-रफ्ता का है इक धुंधला निशान बागी. 
Poet of the Poem/Ghazal or Nazam: Makhdoom Mohiuddin

जाने ये जिन्दगी ले जाएगी कहाँ....!!!


















ले जाएगी ये राह कहाँ वो मंजिलें अपनी 
अनजाने, अनदेखे रास्तों से गुज़र रही है ज़िन्दगी 

ये कशमकश का सिलसिला ये उम्मीदों के जलते दिए 
अंधेरों को हटा कर रौशनी की दे सहर ऐ ज़िन्दगी 

मुस्कुराहटों के दरमियाँ क्यूँ भीगी सी है ज़िन्दगी 
सूनी आँखों के अश्कों को जुगनूँ बना दे ज़िन्दगी 

नींद से खाली रातें, बोझिल से हैं दिन 
सुकून के चार पल हमको अता कर दे ऐ ज़िन्दगी

कभी इंसान सही या गलत नही होता.....














कभी इंसान सही या गलत नही होता,
एक नज़रिया उसे सही या गलत बनाता है,
कोई देखता है कीचड़ में कमल का फूल,
तो किसी को चाँद में भी दाग नज़र आता है !!

किसी की बेवफाई का ग़म क्या करना,
वक़्त तो अक्सर बड़े-बड़े को झुकता है,
बदल जाए ना क्यूँ इंसान की फ़ितरत,
साल भर में चार बार मौसम भी बदल जाता है !!

कभी इनकार का सच कडवा लगता है,
और कभी झूठी हमदर्दी भी प्यारी लगती है,
पर क्यूँ इसपर भी नाराज़ होना,
ये तो अपने मन की मजबूरी होती है !!

रंग, रूप और दौलत का खेल भी अजीब होता है,
खुशियाँ खरीद नही सकता, ग़म बेच नही पाता है,
पर फिर भी कैसी आज़माइश है दुनिया की,
जो समझ गया वो अकेला, जो नहीं वो महफ़िल में होता है !!

सुन लो मेरी बात कहीं से आ जाओ.....












तन्हा है मेरी जात कहीं से आ जाओ 
सुन लो मेरी बात कहीं से आ जाओ 
दुश्मन बाज़ी जीत रहा है चुपके से 
होने को है मात कहीं से आ जाओ 
कच्ची इटें और इमारत गेरे की 
और उसपर बरसात कहीं से आ जाओ 
दिल की बस्ती पर है खौफ अंधेरों का 
हो जाये न रात कहीं से आ जाओ 
कच्ची उमरें उस पर ख्वाब मोहब्बत के 
क्या क्या हैं ज़ज्बात कहीं से आ जाओ 
आँखे रास्ता देख रही हैं मुद्दत से 
गर्दिश में हैं हालात कहीं से आ जाओ 
मौसम मौसम लोग बदलते हैं "ख्वाहिश"
दिल पर हैं सदमात कहीं से आ जाओ.… 

आरज़ू थी तेरी बाँहों में दम निकले....









आरज़ू थी तेरी बाँहों में दम निकले,
कसूर तेरा नही बदनसीब हम निकले. 
जहाँ भी जाये खुश रहे तू सदा, 
दिल से मेरे दुआ सदा यही निकले. 
मेरे होठों की हंसी तेरे होंठो से निकले, 
तेरे ग़म का दरिया मेरे आँखों से निकले. 
ये जिंदगी तुम्हारी सदा हंसती हुई निकले, 
अगर चाहे तो हमे रुलाती हुई निकले. 
अगर जिंदगी में कभी जीना पड़े तेरे बिन, 
तेरी डोली से पहले अर्थी मेरी निकले. 
आरज़ू थी तेरी बाँहों में दम निकले, 
कसूर तेरा नही बदनसीब हम निकले.

सर झुकाने की आदत नही है...


सर झुकाने की आदत नही है
आँशु बहाने की आदत नही है

हम खो गए तो पछताओगे बहुत
हमारी लौट के आने की आदत नही है

तेरे दर पे मोहब्बत के सवाली बन जाते
लेकिन हाथ फ़ैलाने की आदत नही है

तेरी यादें अज़ीज़ हैं बहुत
मगर वक़्त गवांने की आदत नही है

तुम सख्त-दिल निकले क्या शिकवा करें हम
शिकवा-ए-दिल लब पे लाने की आदत नही है।