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कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नही मरा करता है

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों 
मोती व्यर्थ लुटाने वालों 
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नही मरा करता है 

सपना क्या है, नयन सेज पर 
सोया हुआ आँख का पानी 
और टूटना है उसका ज्यों 
जागे कच्ची नींद जवानी 
गीली उमर बनाने वालो, डूबे बिना नहाने वालों 
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नही मरा करता है 

माला बिखर गयी तो क्या है 
खुद ही हल हो गयी समस्या 
आंसू गर नीलाम हुए तो 
समझो पूरी हुई तपस्या 
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों 
कुछ दीपों के मर जाने से, आँगन नही मरा करता है 

खोता कुछ भी नही यहाँ पर 
केवल जिल्द बदलती पोथी 
जैसे रात उतार चांदनी 
पहने सुबह धूप की धोती 
वस्त्र बदल कर आने वालों, चाल बदल कर जाने वालों 
चंद खिलौनों के खोने से, बचपन नही मरा करता है 
                    - गोपाल दास 'नीरज'

दूर कुछ भी नही


दूर कुछ भी नही और समय भी पर्याप्त है 
बस तुम्हारा आत्मबल चलने की प्रेरणा दे दे 
कार्य कितने भी हो और मुश्किले हरपल मिले 
बाजुओं में दम हो, मन करने की आज्ञा दे दे 

                                    राह में कितनी भी विपरीत हवाएं आयें 
                                    और लहरों के वेग बार-बार टकराये 
                                    नाव साहिल पे पहुच जाएगी रफ़ता-रफ़ता 
                                   बुद्धि पतवार पकड़ने की चेतना दे दे 

आँधियों में नन्हे चिराग से पूछो 
मध्य काटों के सुगन्धित गुलाब से पूछो 
जिंदगी सिर्फ सुहानी सुबह का नाम नही 
धुप में जलते हुए अफताब से पूछो 

                                  कुछ असंभव नही है उम्र भी पर्याप्त है 
                                 बस नेक दिल करने की आज्ञा दे दे !

धीरे-धीरे



बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे 
खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे 

किसी को गिराया न खुद को उछाला 
काटा जिंदगी के सफ़र धीरे-धीरे 

जहाँ आप पहुचेंगे छलांगे लगा कर 
वहां मै भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे 

पहाड़ों की कोई चुनौती नही थी 
उठाता गया कोई सर धीरे-धीरे 

गिरा मैं कही तो अकेले में रोया 
गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे
            
                  रामदरश मिश्र जी की कलम से ।