ख्वाब













ख्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है 
ऐसी तन्हाई है कि मर जाने को जी चाहता है 
घर के वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यों 
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है 
डूब जाऊं कोई मौज निशान तक ना बताए 
ऐसी नदी में उतर जाने को जी चाहता है 
कभी मिल जाये तो रस्ते की थकान जग पड़े 
ऐसी मंजिल से गुजर जाने को जी चाहता है 
वो ही पैमान जो कभी जी को खुश आया था बहुत 
उसी पैमान से मुकर जाने को जी चाहता है 

Poet of the Poem / Ghazal or Nazam :Iftikhar Arif

ये चाँदनी भी जिनको छूने से डरती है














ये चाँदनी भी जिनको छूते हुए डरती है 
दुनिया यूँ ही फूलों को पैरों से मसलती है 
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है 
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है 
लबों में चिंगारी जैसे कोई रख दे 
यूँ याद तेरी शब् भर सीने में सुलगती है
आ जाता है खुद खीँच कर दिल, सीने से पटरी पर 
जब रात के सरहद से इक रेल गुजरती है 
आंसू कभी पलकों पर तो देर नही रुकते 
उड़ जाते हैं यूँ पंछी जब शाख लचकती है 
खुश रंग परिंदों के लौट आने के दिन आये 
बिछड़े हुए मिलते हैं, जब बर्फ पिघलती है. 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam :Bashir Badr

कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नही मरा करता है

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों 
मोती व्यर्थ लुटाने वालों 
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नही मरा करता है 

सपना क्या है, नयन सेज पर 
सोया हुआ आँख का पानी 
और टूटना है उसका ज्यों 
जागे कच्ची नींद जवानी 
गीली उमर बनाने वालो, डूबे बिना नहाने वालों 
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नही मरा करता है 

माला बिखर गयी तो क्या है 
खुद ही हल हो गयी समस्या 
आंसू गर नीलाम हुए तो 
समझो पूरी हुई तपस्या 
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों 
कुछ दीपों के मर जाने से, आँगन नही मरा करता है 

खोता कुछ भी नही यहाँ पर 
केवल जिल्द बदलती पोथी 
जैसे रात उतार चांदनी 
पहने सुबह धूप की धोती 
वस्त्र बदल कर आने वालों, चाल बदल कर जाने वालों 
चंद खिलौनों के खोने से, बचपन नही मरा करता है 
                    - गोपाल दास 'नीरज'

शाम से आँख में नमी सी है !















शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है
दफ्न कर दो हमे कि साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है
वक़्त रहता नही कहीं छुपकर
इस की आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नही रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam : Gulzar

सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं














सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं
अपने गुमगश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं
जल गया सारा बदन इन मौसमों के आग में
एक मौसम रूह का है जिसमे अब जिन्दा हूँ मैं
मेरे होठों का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे
तूने मुझको बाग जाना, देख ले सेहरा हूँ मैं
देखिये मेरी पज़ीराई को अब आता है कौन
लम्हा भर को वक़्त के दहलीज़ पर आया हूँ मैं 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam : Athar Nafees