कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नही मरा करता है

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों 
मोती व्यर्थ लुटाने वालों 
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नही मरा करता है 

सपना क्या है, नयन सेज पर 
सोया हुआ आँख का पानी 
और टूटना है उसका ज्यों 
जागे कच्ची नींद जवानी 
गीली उमर बनाने वालो, डूबे बिना नहाने वालों 
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नही मरा करता है 

माला बिखर गयी तो क्या है 
खुद ही हल हो गयी समस्या 
आंसू गर नीलाम हुए तो 
समझो पूरी हुई तपस्या 
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों 
कुछ दीपों के मर जाने से, आँगन नही मरा करता है 

खोता कुछ भी नही यहाँ पर 
केवल जिल्द बदलती पोथी 
जैसे रात उतार चांदनी 
पहने सुबह धूप की धोती 
वस्त्र बदल कर आने वालों, चाल बदल कर जाने वालों 
चंद खिलौनों के खोने से, बचपन नही मरा करता है 
                    - गोपाल दास 'नीरज'

शाम से आँख में नमी सी है !















शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है
दफ्न कर दो हमे कि साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है
वक़्त रहता नही कहीं छुपकर
इस की आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नही रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam : Gulzar

सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं














सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं
अपने गुमगश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं
जल गया सारा बदन इन मौसमों के आग में
एक मौसम रूह का है जिसमे अब जिन्दा हूँ मैं
मेरे होठों का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे
तूने मुझको बाग जाना, देख ले सेहरा हूँ मैं
देखिये मेरी पज़ीराई को अब आता है कौन
लम्हा भर को वक़्त के दहलीज़ पर आया हूँ मैं 
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam : Athar Nafees

आ जाओ किसी रोज तुम तो...












आ जाओ किसी रोज तुम तो, तुम्हारी रूह में उतर जाऊं,
साथ रहूँ मैं तुम्हारे न किसी को नजर आऊँ,
चाहे भी तो कोई छू न सके मुझको 
इस तरह से, तुम कहो तो तुम्हारी बाँहों में बिखर जाऊं,
करूँ जो निछावर मोहब्बत मैं तुमसे लिपट कर,
इस अदा से छू लूँ तुम्हें कि हद से गुजर जाऊं,
अब तो लग जाओ सीने से कि मेरी सांस थम जाये,
आगोश में ले कर अपनी तुम्हारी साँसों में उतर जाऊं.

हँसाती थी मुझको, फिर रुला भी देती थी...














हंसाती थी मुझ को, फिर रुला भी देती थी
कर के वो मुझसे अक्सर वादे, भुला भी देती थी
बेवफा थी बहुत मगर, अच्छी लगती थी दिल को 
कभी-कभी बातें मोहब्बत की, सुना भी देती थी
थाम लेती थी मेरा हाथ, खुद यूँ ही
कभी अपना हाथ मेरे हाथ से, छुड़ा भी लेती थी
कभी बेवक्त चली आती थी, मिलने को
कभी कीमती पल मोहब्बत के, गवां भी देती थी
अजब धुप-छाव सा, मिजाज़ था उसका 
मोहब्बत भी करती थी, और दिल दुखा भी देती थी