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उसकी गलियों से जब लौटे, अपना ही घर भूल गये...
उसकी गलियों से जब लौटे, अपना ही घर भूल गये,
खूब गये परदेश कि अपने दीवारों दर भूल गये,
शीश महल ने ऐसा घेरा मिट्टी के घर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
तुझको भी जब कसमें अपने वादें याद नही,
हम भी अपने ख्वाब तेरी आँखों में रख कर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
मुझको जिन्होंने कोई उन्हें बतलाये नजीर,
मेरी लाश की पहलु में वो अपना खंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
याद नही क्या क्या देखा था सारे मंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
खूब गये परदेश कि अपने दीवारों दर भूल गये,
शीश महल ने ऐसा घेरा मिट्टी के घर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
तुझको भी जब कसमें अपने वादें याद नही,
हम भी अपने ख्वाब तेरी आँखों में रख कर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
मुझको जिन्होंने कोई उन्हें बतलाये नजीर,
मेरी लाश की पहलु में वो अपना खंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
याद नही क्या क्या देखा था सारे मंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
दिलों में समा नही सकती...
लबों पे रूकती, दिलों में समां नही सकती
वो एक बात जो लफ़्ज़ों में आ नही सकती
जो दिल में हो नज़र-ए-ग़म तो अश्क पानी है
के आग खाक को कुंदन बना नही सकती
के आग खाक को कुंदन बना नही सकती
यकीन, गुमान से बाहर तो हो नही सकता
नज़र ख्याल से आगे तो जा नही सकती
नज़र ख्याल से आगे तो जा नही सकती
दिलों की रम्ज़ फ़क़त एहल-ए-दिल जानते हैं
तेरी समझ में मेरी बात आ नही सकती
तेरी समझ में मेरी बात आ नही सकती
ये सौज-ए-इश्क तो गूंगे का ख्वाब है जैसे
मेरी जुबां मेरी हालात बता नही सकती
मेरी जुबां मेरी हालात बता नही सकती
सिमट रही है मेरे बाजुओं के हलके में
ह्या के बोझ से पलकें उठा नही सकती
ह्या के बोझ से पलकें उठा नही सकती
जो कह रहा है सुलगता हुआ बदन उस का
बता भी पाती नही, और छुपा नही सकती
बता भी पाती नही, और छुपा नही सकती
एक ऐसे हिजर की आतिश है मेरे दिल में जैसे
किसी विशाल की बारिश बुझा नही सकती
किसी विशाल की बारिश बुझा नही सकती
तो जो भी होना है अमजद यहीं पे होना है
ज़मीं मदार से बाहर तो जा नही सकती
ज़मीं मदार से बाहर तो जा नही सकती
:- अमज़द इस्लाम अमजद
मेरी चाहत का है महावर ये नगर जैसा भी है....!
जिस तरह की हैं ये दीवारें ये दर जैसा भी है
सर छिपाने को मयस्सर तो है घर जैसा भी है
उस को मुझसे मुझको उस से निस्बतें हैं बेशुमार
मेरी चाहत का है महावर ये नगर जैसा भी है
चल पड़ा हूँ शौक़-ए-बेपरवाह को मुरशद मान कर
रास्ता परपेच है या पुर्खतर जैसा भी है
सब गंवारा है थकन दुखन सारी चुभन
एक खुशबू के लिए है ये सफ़र जैसा भी है
वो तो है मखसूस इक तेरी मोहब्बत के लिए
तेरा 'अनवर' बाहुनर या बेहुनर जैसा भी है
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam :Anwar Masood
सर छिपाने को मयस्सर तो है घर जैसा भी है
उस को मुझसे मुझको उस से निस्बतें हैं बेशुमार
मेरी चाहत का है महावर ये नगर जैसा भी है
चल पड़ा हूँ शौक़-ए-बेपरवाह को मुरशद मान कर
रास्ता परपेच है या पुर्खतर जैसा भी है
सब गंवारा है थकन दुखन सारी चुभन
एक खुशबू के लिए है ये सफ़र जैसा भी है
वो तो है मखसूस इक तेरी मोहब्बत के लिए
तेरा 'अनवर' बाहुनर या बेहुनर जैसा भी है
Poet of the Poem / Ghazal or Nazam :Anwar Masood
जहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है ! Jahan ko Apni Tabahi ka Intzar Sa Hai.
कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है
जहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है
मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़ज़ा
कि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार सा है
मैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँ
कि आज दामन-ए-यज़दाँ भी तार-तार-सा है
सजा-सँवार के जिसको हज़ार नाज़ किए
उसी पे ख़ालिक़-ए-कोनैन शर्मसार सा है
तमाम जिस्म है बेदार, फ़िक्र ख़ाबीदा
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार सा है
सब अपने पाँव पे रख-रख के पाँव चलते हैं
ख़ुद अपने दोश पे हर आदमी सवार सा है
जिसे पुकारिए मिलता है इस खंडहर से जवाब
जिसे भी देखिए माज़ी के इश्तेहार सा है
हुई तो कैसे बियाबाँ में आके शाम हुई
कि जो मज़ार यहाँ है मेरे मज़ार सा है
कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है !!
( कैफ़ी आजमी )
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