आ जाओ किसी रोज तुम तो...












आ जाओ किसी रोज तुम तो, तुम्हारी रूह में उतर जाऊं,
साथ रहूँ मैं तुम्हारे न किसी को नजर आऊँ,
चाहे भी तो कोई छू न सके मुझको 
इस तरह से, तुम कहो तो तुम्हारी बाँहों में बिखर जाऊं,
करूँ जो निछावर मोहब्बत मैं तुमसे लिपट कर,
इस अदा से छू लूँ तुम्हें कि हद से गुजर जाऊं,
अब तो लग जाओ सीने से कि मेरी सांस थम जाये,
आगोश में ले कर अपनी तुम्हारी साँसों में उतर जाऊं.

हँसाती थी मुझको, फिर रुला भी देती थी...














हंसाती थी मुझ को, फिर रुला भी देती थी
कर के वो मुझसे अक्सर वादे, भुला भी देती थी
बेवफा थी बहुत मगर, अच्छी लगती थी दिल को 
कभी-कभी बातें मोहब्बत की, सुना भी देती थी
थाम लेती थी मेरा हाथ, खुद यूँ ही
कभी अपना हाथ मेरे हाथ से, छुड़ा भी लेती थी
कभी बेवक्त चली आती थी, मिलने को
कभी कीमती पल मोहब्बत के, गवां भी देती थी
अजब धुप-छाव सा, मिजाज़ था उसका 
मोहब्बत भी करती थी, और दिल दुखा भी देती थी

गुस्ताख़ दिल की मेरे बस इतनी सी है ख्वाइश | SketchyHeart

तेरे सीने से लग कर, तेरी आरजू बन जाऊँ
तेरी साँसों से मिलकर, तेरी खुशबू बन जाऊं
फासले ना रहे कोई हम दोनों के दरमियां
मैं, मैं ना रहूँ,बस तू ही तू बन जाऊ

सुनी रातों की तन्हाईयाँ जब सताएगी तुझे
तेरी उन खामिशियों की गुफ्तगू बन जाऊ

जैसे दिलबर की हो तुझ को तमन्ना जाना
रब करे मैं वैसी हु-ब-हु बन जाऊ

गुस्ताख दिल की मेरे बस इतनी सी है ख्वाइश
तेरी धडकनों की मैं ही जुस्तुजू बन जाऊ

तेरे बारे में जब सोचा नही था ...

तेरे बारे में जब सोचा नही था
मैं तन्हा था मगर, इतना नही था 
तेरी तस्वीर से करता थे बातें 
मेरे कमरे में आईना नही था 
समंदर ने मुझे प्यासा ही रखा 
मैं जब सहारा में था प्यासा नही था 
मनाने रूठने के खेल में हम 
बिछड़ जाएँगे सोचा न था 
सुना है बंद कर ली उसने आँखे 
कई रातों से वो सोया नही था 

उसकी गलियों से जब लौटे, अपना ही घर भूल गये...
















याद नही क्या क्या देखा, सारे मंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे, अपना ही घर भूल गये,
खूब गये परदेश कि अपने दीवारों दर भूल गये,
शीश महल ने ऐसा घेरा मिट्टी के घर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
तुझको भी जब कसमें अपने वादें याद नही,
हम भी अपने ख्वाब तेरी आँखों में रख कर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
मुझको जिन्होंने कोई उन्हें बतलाये नजीर,
मेरी लाश की पहलु में वो अपना खंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.
याद नही क्या क्या देखा था सारे मंजर भूल गये,
उसकी गलियों से जब लौटे अपना ही घर भूल गये.