ये तूने क्या किया है !











है हसरतों की ये ख्वाइश, या खुदा की है नुमाइश 
जो आजकल गुलज़ार वीरान हुआ है 
जो होता है वो अच्छे के लिए होता है अगर 
तो क्यूँ मैं मानना ना चाहूँ, कि जो हुआ है वो भला हुआ है !

कभी सोचता हूँ, और चौंक जाता हूँ ,
की ये जो हुआ, वो आखिर क्या हुआ है ?
बदलनी ही थी किस्मत को राह अगर,
तो वो क्यों चुनी जिसमे तू शामिल ना हुआ है ?

रात दिन, दिन रात, एक ही सवाल खाए है मुझे,
कि किस खता से तू रुसवा हुआ है ?
तुझे बचाने की जरुरत मेरी इतनी बदगुमान थी अगर,
तो क्यूँ इस रंजिश में मेरा ही दिल क़ुर्बान हुआ है ?

क्या करूँ, कैसे कहूँ, कि तेरी नादानी का ये कैसा वाक़िआ है,
कि जब खुलेंगे आँखें तेरी, तो तुझे लगेगा आइना भी दुश्वार हुआ है,
और मिला सके उस वक़्त तू खुद के नजर अगर,
तो याद करके इस पल को सोचना, कि तूने ये क्या किया है !

मगर जब याद आएंगी.....


कभी जो हम नहीं होंगे
कहो किस को बताओगे
वो अपनी उल्झने सारी
वो बेचैनि में डूबे पल्
वो आँखों में छुपे आन्शु
किसे फिर तुम दिखाओगे
बहुत बेचैन् होन्गे तुम
बहुत तनहा रह जाओगे
अभी भी तुम नहीं समझे
हमारी अनकही बातें
बहुत तुमको रुलाएन्गी
बहुत चाहोगे फिर भी तुम
हमे ना ढुन्ढ् पाओगे
कभी जो हम नहीं होंगे
कहो किस को बताओ

सर झुकाने की आदत नही है...


सर झुकाने की आदत नही है
आँशु बहाने की आदत नही है

हम खो गए तो पछताओगे बहुत
हमारी लौट के आने की आदत नही है

तेरे दर पे मोहब्बत के सवाली बन जाते
लेकिन हाथ फ़ैलाने की आदत नही है

तेरी यादें अज़ीज़ हैं बहुत
मगर वक़्त गवांने की आदत नही है

तुम सख्त-दिल निकले क्या शिकवा करें हम
शिकवा-ए-दिल लब पे लाने की आदत नही है।

कुछ देर पहले नींद से......

कल रात जाने क्या हुआ, 
कुछ देर पहले नींद से,
कुछ अश्क मिलने आ गए,
कुछ ख्वाब भी टूटे हुए,
कुछ लोग भी भूले हुए,
कुछ गर्द में लिपटे हुए। 

 कुछ बेपनाह पहेली हुई,
कुछ खोल में सिमटी हुई,
बेरब्त सी सोचें लिए 
भूली हुई बातें लिए,
इक शख्स की यादें लिए,
फिर देर तक जागते रहे। 

सोचों में गुम बैठे रहे,
ऊँगली से ठन्डे फर्श पर,
इक नाम बस लिखते रहे,
कल रात भी वो रात थी,
                                                   कुछ देर पहले नींद से,
                                                   हम देर तक रोते रहे। 

सवेरे जब आजानों की सदायें आने लगती हैं.....


सवेरे जब आजानों की सदायें आने लगती हैं 
हमारे घर में जन्नत की हवाएँ आने लगती हैं 

बुजुर्गों की इनायत का सहारा मिल गया मुझको 
जिधर से भी गुजरती हूँ दुआएँ आने लगती हैं 

जहाँ क़ुरान नही दिल में रसाले रखे जाते हैं 
ज़माने भर की उस घर में बालाएं आने लगती हैं 

                                                      मैं लड़की हूँ हया वाली अचानक चौंक पड़ती हूँ 
                                                      किसी की आहटें जब दायें बाएं आने लगती हैं 
                                                                                     - साभार दीपाली मेहता