बेदर्दी ये ज़माना है


मेरे हर लफ्ज़ में दर्द का फ़साना है 
मेरे हर रोम में गम का एक तराना है 
वो इसलिए नही क्योकि ये दिल आशिकाना है 
पर इस लिए क्युकी बेदर्दी ये ज़माना है 

सब कहते हैं कि भूल जाओ जख्म अब पुराना है 
उठो ऐसे की समझो सितारों को पाना है 
ज़ालिम बड़ा काम ये दिल को समझाना है 
कब माना था ये , जो अब इसने माना है 

आप कहते हैं कि चार पंक्तियाँ सुनाइए 
अपने नगमों से महफ़िल की शोभा बढाइये 
पर गम कहाँ किसी महफ़िल का खज़ाना है 
जैसे लाज़मी शमा-ए-महफ़िल में जलता परवाना है 
वैसे ही जनाब , बड़ा बेदर्दी ये जमाना है 

अज़ब ढूंढता हू !


लिखने का अफ़साना अजब ढूंढ़ता हू 
गुनगुनाने का तराना अज़ब ढूंढ़ता हू 
देकर खुद को कोई झूठी तसल्ली 
मुस्कुराने का बहाना अज़ब ढूंढता हू 

भुलाने का फ़साना अज़ब ढूंढता हू 
यादों का नज़राना अज़ब ढूंढता हू 
अन्त का वो सिरा जहाँ छूटा था सबकुछ 
एक वो ठिकाना अज़ब ढूंढता हू 

खोया वो परवाना अज़ब ढूंढता हू 
मन वो दीवाना अज़ब ढूंढता हू 
एहसास -ए-रूह को बहला पाऊं मैं 
ऐसा वो जमाना अज़ब ढूंढता हू 

गुमान !

मेरे लफ़्ज़ों से न कर मेरे किरदार का फैसला 
तेरा वजूद मिट जाएगा मेरी हकीकत ढूंढ़ते - ढूंढ़ते 
और अगर है कोई गुंजाइस तो आजमा के देख ले 
पर तेरा दामन ना भीग जाएगा मेरी तबीयत देखते देखते !

मेरी मुस्कान से न कर मेरे दर्द का फैसला 
बड़ी मुश्किल से ला पाता हु मैं अपने आंसू रोकते रोकते 
और अगर है हौसला तो मिलाके देखले नज़र 
पर तेरी नज़र न झुक जाये मेरी असलियत देखते - देखते !

मेरी हरकतों से ना कर मेरे जज़बातों का फैसला 
तेरा ईमान डगमगा जाएगा मेरे ऊसूल सुनते सुनते 
है सीने में मेरे अगन ऐसी की उसकी सुलग में 
गुजर गये कितने अपने अरमान सेंकते - सेंकते !

दूर कुछ भी नही


दूर कुछ भी नही और समय भी पर्याप्त है 
बस तुम्हारा आत्मबल चलने की प्रेरणा दे दे 
कार्य कितने भी हो और मुश्किले हरपल मिले 
बाजुओं में दम हो, मन करने की आज्ञा दे दे 

                                    राह में कितनी भी विपरीत हवाएं आयें 
                                    और लहरों के वेग बार-बार टकराये 
                                    नाव साहिल पे पहुच जाएगी रफ़ता-रफ़ता 
                                   बुद्धि पतवार पकड़ने की चेतना दे दे 

आँधियों में नन्हे चिराग से पूछो 
मध्य काटों के सुगन्धित गुलाब से पूछो 
जिंदगी सिर्फ सुहानी सुबह का नाम नही 
धुप में जलते हुए अफताब से पूछो 

                                  कुछ असंभव नही है उम्र भी पर्याप्त है 
                                 बस नेक दिल करने की आज्ञा दे दे !

जिंदगी से समझौता कर लिया हमने...


जिंदगी से समझौता कर लिया हमने 
आप हमारे लिए ना थे, यही सोचकर 
सारे गम भी सह लिए हमने 
किसी से शिकायत क्या करते 
जब छोड़ा साथ अपनों ने ही हमारा 
हम डूबे ऐसे भवर में 
जिससे निकला ना कोई किनारा 
आप किसी और के हो जाएँगे 
ये शायद हमें पहले ही पता होता 
हम यकीं न करते इस दिल पे कि 
ये अपना होकर ही दगा देगा 
ना दिल चाहता आपको 
ना दिल में कोई हसरत होती 
हम खोये रहते अपने ही ख्यालों में 
किसी और की चाहत ही न होती 
हम तनहा हुए ऐसे कि 
परछाई भी साथ नही 
किसी से कुछ भी कहते अब 
दिल में ऐसी कोई बात नही.