यहाँ हर शख्स हर पल हादसा होने से डरता है

यहाँ हर शख्स हर पल हादसा होने से डरता है 
खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है 

मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम सा बच्चा 
बड़ो की देखकर दुनिया, बड़ा होने से डरता है

ना बस में ज़िन्दगी इसके ना काबू मौत पर इसका 
मगर इंसान फिर भी कब खुदा होने से डरता है 

अजब ये जिंदगी की कैद है, दुनिया का हर इंसान 
रिहाई मांगता है और रिहा होने से डरता है 



आशार मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं

अशार मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं 
कुछ शेर फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं 

अब ये भी नही ठीक के हर दर्द मिटा दें 
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं 

आँखों में जो भर लोगे तो कांटो से चुभेंगे 
ये ख्वाब तो पलकों पर सजाने के लिए हैं 

देखूं तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाँथ 
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं 

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की 
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए है

ये इल्म का सौदा, ये रिसाले ये कीताबें 
इक शख्स की यादों को भुलाने के लिए है

- जान निशार अख्तर 


धीरे-धीरे



बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे 
खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे 

किसी को गिराया न खुद को उछाला 
काटा जिंदगी के सफ़र धीरे-धीरे 

जहाँ आप पहुचेंगे छलांगे लगा कर 
वहां मै भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे 

पहाड़ों की कोई चुनौती नही थी 
उठाता गया कोई सर धीरे-धीरे 

गिरा मैं कही तो अकेले में रोया 
गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे
            
                  रामदरश मिश्र जी की कलम से ।

मेरी दीवानगी अपना ठिकाना धूंढ लेती है

मेरी खामोशियों में भी फ़साना ढूंढ़ लेती है
बड़ी शातिर है ये दुनिया बहाना ढूंढ़ लेती है 

हकीकत जिद किये बैठी हैं चकनाचूर करने को 
मगर हर आँख फिर सपना सुहाना ढूंढ़ लेती हैं

उठाती हैं जो खतरा हर कदम पर डूब जाने का 
वही कोशिश समुंदर में खजाना ढूंढ़ लेती है 

ना चिड़िया की काम न कारोबार है कोई 
वो केवल हौशले से आबो-दाना ढूंढ़ लेती है 

जूनून मंजिल का राहों में बचाता है भटकने से 
मेरी दीवानगी अपना ठिकाना ढूंढ़ लेती है

कश्तियाँ उलटने में देर कितनी लगती है...

आग को जलने में देर कितनी लगती है 
बर्फ के पिघलने में देर कितनी लगती है 

चाहे कोई रुक जाए, चाहे कोई रह जाये 
काफिलों के चलने में देर कितनी लगती है 

चाहे कोई जैसे भी हमसफ़र हो शदियों से 
रास्ता बदलने में देर कितनी लगती है 

ये तो वक़्त के बस में है कि कितने मोहलत दे 
वरना वक़्त ढलने में देर कितनी लगती है  

सच के ज़मीनों पर रास्ते जुदा हो तो 
दूर जा निकलने में देर कितनी लगती है 

उम्र भर का बंधन भी पाल भर में टूट जाता है 
सोच को बदलने में देर कितनी लगती है 

जब हवा मुख़ालिफ़ हो, मौज में समन्दर हो 
कश्तियाँ उलटने में देर कितनी लगती है